देश की बेटियां मेहनत और लगन की लगातार मिसालें पेश कर रहीं हैं। अपने अपने खेल में इन बेटियों का कोई जवाब प्रतिव्दंदियों के पास नज़र नहीं आ रहा है। मेरीकॉम, हिमा दास, दीपा करमाकर, सायना नेहवाल, गीता और बबीता फोगाट ने तो अपने देश का परचम विदेशी धरती पर लहराया ही है। अब पीवी सिंधू ने वो काम कर दिखाया जो आज तक किसी महिला खिलाड़ी नहीं किया है। इन सभी महिला खिलाड़ियों ने जिस तरह से अपने लक्ष्य को हासिल किया है वह आने वाले समय में प्रेरणा की स्त्रोत बनी रहेंगी। 5 जुलाई 1995 में जन्मी सिंधू ने छ: वर्ष की छोटी उम्र में देश के एक बैडमिंटन खिलाड़ी के खेल से प्रभावित होकर बैडमिंटन का रैकेट थाम लिया। ये खिलाड़ी थे पुलेला गोपीचंद जो 2001 में ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन टूर्नामेंट के चैम्पियन बने। पीवी सिंधू ने महज आठ वर्ष की उम्र में बैडमिंटन खेलना शुरू कर दिया था। इंडियन रेलवे सिग्नल इंजीनियरिंग और दूर संचार के बैडमिंटन कोर्ट में महबूब अली सानिध्य में बैडमिंटन की शुरूआती सीख हासिल की। बाद में उन्होंने गोपीचंद के अकादमी में दाखिला लिया और बैडमिंटन के सारे गुरू सीखने शुरू कर दिए थे। तब से आज तक सिंधू ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 24 अगस्त 2019 को वह विश्व चैंपियन बन गई। वे भारत की पहली महिला बैडमिंटन खिलाड़ी हैं जिन्होंने यह बड़ी जीत हासिल की है। सिंधू ने विश्व के प्राय: सभी ऐसे देश जहां बैडमिंटन की बड़ी प्रतियोगिताएं होती है वहां वे रजत, कांस्य या गोल्ड जीत चुकी हैं। सिंधू ने यह बता दिया है कि यदि ठान लिया जाय तो वह किसी भी चीज को हसिल किया जा सकता है, बशर्तें इसके लिए वह कड़ी मेहनत, लगन और अनुशासन में रहकर कर प्रयास करे। सिंधू के पिता व्हालीबाल के पेशेवर खिलाड़ी थे, उनका भरपूर प्रोत्साहन सिंधू को मिला। इसके अलावा पुलेला गोपीचंद जो उनके बैडमिंटन के कोच हैं उन्होंने भी सिंधू पर कड़ी मेहनत की।

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