नई दिल्ली: दिल्ली में पलूशन के खतरनाक स्तर के बीच हाल ही में जब भारत-बांग्लादेश के बीच होने वाले मैच को लेकर अटकलें लगाई गईं तो इस सीरीज में भारतीय टी 20 टीम की कप्तानी कर रहे रोहित शर्मा ने कहा कि वह पहले भी ऐसे प्रदूषण के बीच खेल चुके हैं और उन्हें किसी तरह की कोई परेशानी नहीं हुई है। लेकिन इसी दिन बांग्लादेशी क्रिकेटर लिटन दास समेत कई अन्य बांग्लादेशी खिलाड़ी ऐंटी पलूशन मास्क लगाकर दिल्ली में खेल की प्रैक्टिस करते नजर आए। उधर बीसीसीआई चीफ सौरभ गांगुली ने भी संकेत दिए हैं कि आगे से दिवाली के बाद उत्तर भारत में मैच आयोजन पर विचार नहीं किया जाएगा। इससे यह तो साफ जाहिर होता है कि अन्तरराष्ट्रीय खिलाडिय़ों के लिए भी दिल्ली का पलूशन चिंता का कारण बन चुका है। वह भी तब जब इन खिलाडिय़ों को बेस्ट ऐंटी पलूशन मास्क, बेस्ट मेडिकल काउंसलिंग और सुविधाएं दी जाती हैं। लेकिन जाहिर है कि स्थानीय स्तर पर खेलने वाले खिलाडिय़ों के पास इतनी सुविधाएं नहीं होती हैं। ऐसे में दिल्ली के स्थानीय खिलाड़ी और कोच कैसे इस पलूशन के बीच अपने खेल की प्रैक्टिस को जारी रखे हुए हैं, यही हमने जानने की कोशिश की।
खिलाडिय़ों के स्टेमिना पर असर
दिल्ली में अलग-अलग खेल से जुड़े कोचों के मुताबिक, भारी पलूशन के चलते इन दिनों में जहां एक ओर खिलाडिय़ों को सांस संबंधी दिक्कतें होती हैं, वहीं उनका स्टेमिना भी कम होने लगता है। नोएडा स्थित वंडर्स क्रिकेट अकादमी के कोच फूलचंद शर्मा बताते हैं, पलूशन की वजह से इन दिनों कुछ बच्चे तो खुद ही प्रैक्टिस पर नहीं आते हैं, तो कुछ बच्चों के पैरंट्स नहीं आने देते। हमने भी अपनी अकादमी के खिलाडिय़ों को छूट दी है कि अगर आप छुट्टी लेते हैं, तो कोई बात नहीं।
उन्होंने कहा, दरअसल, इतने पलूशन में आप जब प्रैक्टिस के दौरान ज्यादा ऑक्सिजन लेते हैं, तो सांस फूलने लगती है और स्टेमिना कम हो जाता है। वह आगे बताते हैं, जो बच्चे प्रैक्टिस के लिए आ रहे हैं, उनसे आउटडोर एक्सरसाइज कम करवाई जा रही है और फिर डेली रूटीन भी हल्का कर दिया है। कुछ बच्चों ने आंख-सांस से जुड़ी शिकायतें भी की हैं। इतनी धुंध में विजिबिलिटी पर भी असर पड़ता है। अगर पलूशन का स्तर एक-दो दिन में कम नहीं होता है तो आने वाले दिनों में हमें कुछ दिनों के लिए अपनी अकादमी की छुट्टी भी करनी पड़ सकती है।
सामने आने लगी हैं सांस संबंधी शिकायतें
कडक़डड़ूमा स्थित मिश्रा स्पोर्ट्स क्लब में खिलाड़ी क्रिकेट की कोचिंग लेते हैं। इसके असिस्टेंट कोच रोहित कुमार गोठवाल बताते हैं, दिवाली के बाद से अब तक तो कोई टूर्नमेंट नहीं हुआ है, लेकिन प्रैक्टिस लगातार जारी है। कल ही दो खिलाडिय़ों ने मुझसे सांस में दिक्कत की शिकायत की तो हमें उन्हें फील्ड से बाहर बिठाना पड़ा। वह आगे बताते हैं, दिल्ली का पलूशन न तो एक दिन का है और न ही पहली बार है। हालांकि यह साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में पलूशन के दिनों में हम खिलाडिय़ों की दौड़-भाग कम करवा देते हैं, जैसे कि इस समय हम रनिंग और फील्ड वर्कआउट नहीं करवाते हैं, क्योंकि फिर उन्हें ज्यादा ऑक्सिजन की जरूरत पड़ती है।
गोठवाल ने आगे कहा, इन दिनों हम सिर्फ नेट प्रैक्टिस करवा रहे हैं, जिसमें बच्चे बैटिंग कर रहे हैं। हम बच्चों से फील्डिंग नहीं करवा रहे हैं, क्योंकि उसमें काफी दौडऩा पड़ता है। इसके अलावा हवा बहुत ज्यादा खराब है, तो हम खिलाडिय़ों की छुट्टी भी जल्दी कर दे रहे हैं। इस हवा की वजह से कोई खिलाड़ी छुट्टी तो नहीं कर रहा? इसके जवाब में रोहित कहते हैं, दस साल तक के जूनियर खिलाड़ी तो छुट्टी ही करते हैं, क्योंकि उनके पैरंट्स आने ही नहीं देते। बड़े बच्चे आते हैं, मगर उन्हें भी परेशानी होती है।
टाल देने चाहिए गेम्स
दिल्ली सॉकर असोसिएशन के पूर्व सेक्रटरी एनके भाटिया के मुताबिक, इन दिनों आउटडोर गेम्स को बंद कर देना चाहिए। वह कहते हैं, जब तक पलूशन खतरनाक स्तर पर है, तब तक आउटडोर गेम्स को टाल देना चाहिए। जब कोई आउटडोर खेलेगा, तो सांस के साथ सब कुछ लंग्स में जाएगा। जब तक वातावरण ठीक नहीं होता, तब तक खेलों को टाल देना चाहिए, क्योंकि पहले तो हवा शुद्ध होनी चाहिए न! जो 18-20 साल वाले बच्चे हैं, वे कहां से इतना झेलेंगे। वह आगे कहते हैं, खेलने वाले बच्चों की भी शिकायतें होती हैं खराब तबीयत की। सभी बच्चों के चेकअप तो होते नहीं कि पता लगे कि कितना इफेक्ट है। थोड़े दिन खेल रोक देने से कुछ नहीं होगा। खिलाडिय़ों को फिट रखना जरूरी है।
खिलाडिय़ों की हड्डियों पर असर
दिल्ली का यह पलूशन सिर्फ आंख और सांस से जुड़ी बीमारियां ही नहीं देता है, बल्कि हड्डियों पर भी गहरा असर डालता है। इस बारे में एम्स के पूर्व ऑर्थोपेडिक सर्जन अरुण पांडे बताते हैं, प्रदूषण का यह खतरनाक स्तर खिलाडिय़ों को सिर्फ सांस की बीमारियां ही नहीं देता बल्कि हड्डियों को भी कमजोर करता है, जो कि उनके खेल के करियर लिए ठीक नहीं है। दरअसल खिलाड़ी को प्रैक्टिस के दौरान मैदान में रहना होता है और ऑक्सिजन भी ज्यादा चाहिए होती है। ऐसे में प्रदूषण उसे ज्यादा प्रभावित करता है।
डॉ. पांडे बताते हैं, प्रदूषण का यह स्तर उनमें ऑस्टियोपोरोसिस नाम की बीमारी को बढ़ावा देता है। इसमें हड्डियां कमजोर हो जाती हैं यानी जिस सामान्य चोट पर हड्डी नहीं टूटनी चाहिए, उसमें भी हड्डी टूटती है। इसमें भी कलाई की हड्डी टूटने का खतरा ज्यादा रहता है। इसके अलावा हड्डियों से जुड़ी अन्य परेशानियां भी उन्हें हो सकती हैं। इसके अलावा धुंध की वजह से धूप भी नहीं निकलती है यानी कि जो विटामिन डी मिलना है, वह भी बंद हो जाता है। इससे भी हड्डियों को नुकसान पहुंचता है।
स्कूलों की आउटडोर ऐक्टिविटीज पर रोक
दिल्ली सरकार ने भी बढ़ते पलूशन को देखते हुए स्कूलों से आउटडोर ऐक्टिविटीज को रद्द करने के लिए कहा है। निर्देश में कहा गया कि इस खतरनाक प्रदूषित वातावरण के बीच आउटडोर ऐक्टिविटीज बच्चों की सेहत पर लंबे समय के लिए असर डाल सकती हैं। इसलिए सभी सरकारी, प्राइवेट स्कूलों को निर्देश दिया जाता है कि जब तक गंभीर स्तर के प्रदूषण की स्थिति बनी हुई है, तब तक कोई भी आउटडोर ऐक्टिविटी न करवाई जाए।
जब तीन दिन बंद रखा था ग्राउंड
इंटरनैशनल आर्चरी कोच लोकेशचंद के अनुसार, कहते हैं कि आने वाले दिनों में गेम्स कॉम्पिटीशन हैं, लेकिन पलूशन की वजह से खिलाडिय़ों की सही प्रैक्टिस नहीं हो पा रही है। वह बताते हैं, इस पलूशन में बच्चे ठीक से प्रैक्टिस ही नहीं कर पा रहे हैं। यहां तक कि शाम को जब वह दौड़ के लिए ग्राउंड पर आते हैं, तो हमें वह भी मना करना पड़ता है। साथ ही प्रैक्टिस भी कम होती है, क्योंकि धुंध में चीजें कम नजर आती हैं और आंखों में भी प्रॉब्लम आती है और आर्चरी में तो आंखें बहुत अहम किरदार अदा करती हैं। बहुत सारे बच्चे हैं, जो खांसी और सांस से जुड़ी दिक्कतों की शिकायत कर रहे हैं। यहां तक कि इस माहौल में तो हम भी दिक्कत फील करते हैं।
वह आगे बताते हैं, अभी आने वाले दिनों में खेल के कई टूर्नमेंट होने हैं, तो बच्चे प्रैक्टिस की जिद करते हैं। हम उनको रोक भी नहीं सकते, लेकिन प्रैक्टिस करवाते हुए भी डर लगता है। दो साल पहले तो इतना बुरा हाल था कि मुझे 3 दिन तक ग्राउंड बंद रखना पड़ा था, ताकि कोई बच्चा प्रैक्टिस न कर पाए। इससे उनकी परफॉर्मेंस पर बहुत बुरा असर पड़ता है।

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