इन दिनों इस बात पर बहस और विवाद की स्थिति बनी हुई है कि देश के सामरिक हितों पर लिए गए फैसलों का श्रेय किसी राजनैतिक दल को दिया जाना चाहिए या नहीं ? आजादी के बाद से देश के प्रधानमंत्रियों ने कई ऐसे फैसले लिए हैं जो सामरिक दृष्टि से देशहित में साबित हुए हैं। यदि इतिहास देखें तो इसका श्रेय, फैसले लेने वालों को दिया गया। यदि फैसले गलत लिए गए हों या फिर ऐसे फैसलों के बाद जनता की दृष्टि में वह गलत साबित हुआ हो तो जनता ने उसकी जवाबदारी भी तय की है। वर्तमान में कुछ ऐसी घटनाएं देश में घटी हैं जिसका श्रेय केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने लिया है वहीं उसके कुछ फैसलों को नकारा भी गया है।

राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों में सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट में एयर स्ट्राइक और बालासोर में एंटी सेटेलाइट बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण जैसे बड़े फैसले वर्तमान सरकार ने लिए हैं, लेकिन विपक्ष को इस पर आपत्ति है। आपत्ति उठाना विपक्ष का अधिकार है। लेकिन सवाल उठता है कि कई अच्छे फैसले कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारों ने लिए हैं तो क्या कांग्रेस की तत्कालीन नेतृत्व को उसका श्रेय नहीं दिया जाना चाहिए? लेकिन उन्हें श्रेय दिया गया। मसलन 3 दिसंबर 1971 में बंग्लादेश की आजादी के लिए शुरू हुई लड़ाई जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी को यह श्रेय जनता और विपक्ष ने सम्मान के साथ दिया।

इतिहास में 13 दिन की इस लड़ाई की तारीख को याद करते हैं तो इंदिराजी का चेहरा स्वत: ही दिमाग में आता है। बताया जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल जी ने स्व. इंदिरा गांधी को माँ दुर्गा की संज्ञा दी थी। यह भी इस लड़ाई की तारीख के साथ स्मरण हो उठता है। स्व. इंदिरा जी के इस फैसले ने उन्हें जनता के बीच एक सशक्त प्रधानमंत्री के तौर पर स्थापित कर दिया था। इसके बाद स्व. इंदिरा जी के फैसले की वजह से 18 मई 1974 को पोखरण में परमाणु परीक्षण किया गया जो सामरिक दृष्टि से भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण था।

अंतर्राष्ट्रीय दबावों की परवाह न करते हुए भारत के पहले परमाणु परीक्षण के फैसले का श्रेय भी उन्हें जाता है। लेकिन इसके कुछ वर्षों के बाद उनके द्वारा देश में लगाई गई इमरजेंसी के लिए उन्हें जवाबदार भी माना जाता है और आलोचना भी की जाती है। कुछ एक फैसलों को छोड़ दें तो इंदिराजी का कार्यकाल देश और कांग्रेस का स्वर्णिम कार्यकाल रहा है।

उन्होंने पंजाब में आतंकियों को खत्म करने के लिए स्वर्ण मंदिर में सेना भेजने का जो निर्णय लिया उसने पंजाब से आतंकियों का पूरी तरह से सफाया कर दिया। इसके लिए उन्होंने अपनी जान की परवाह न कर यह कड़ा फैसला लिया था। इस फैसले की वजह से ही 31 अक्टूबर 1984 को उनकी हत्या कर दी गई थी। इंदिरा जी की हत्या के बाद उनके पुत्र स्व. राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। संचार क्रांति की शुरूआत का श्रेय उन्हें जाता है क्योंकि यह फैसला उन्होंने लिया था। साथ ही 1987 में श्रीलंका में भारतीय शांति सेना भेजने का फैसला भी उन्होंने किया था, तब श्रीलंका सरकार का लिट्‌टे के साथ गृहयुद्ध चल रहा था। यह फैसला लेते वक्त उन्होंने भी अपनी जान की परवाह नहीं की।

उनके फैसलों को सही तो माना जाता है लेकिन परिस्थितियों के अनुकूल नहीं माना जाता वहां भारतीय सेना को काफी नुकसान भी हुआ। 29 जुलाई 1987 को श्रीलंका में सैनिक परेड का निरीक्षण करते वक्त एक सैनिक ने राजीव गांधी पर बंदूक की बट से हमला किया था। इसके बाद लिट्‌टे के आत्मघाती हमलावरों ने चुनाव रैली के दौरान 21 मई 1991 को उनकी हत्या कर दी थी। ऐसे ही कुछ फैसले बाद के गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्रियों ने भी लिए हैं जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आता है। उन्होंने 24 वर्षों के बाद एक बार फिर 11 व 13 मई 1998 को पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण कर एक बार फिर भारत की परमाणु शक्ति का अहसास दुनिया को करवाया। साथ ही मई 1999 में कारगिल मे भारतीय क्षेत्र में कब्जा करने वाले पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना की कार्यवाही का बड़ा फैसला लेते हुए कब्जा किए गए क्षेत्र को मुक्त करवाया इन दोनो ही फैसलों का श्रेय स्व. अटल जी को दिया जाता है वहीं भारतीय सेना को हुए नुकसान के लिए उनकी आलोचना भी हाती है। इसी तरह से कुछ कड़े फैसले वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी लिए है जो पाकिस्तान के आतंकी गतिविधियों के खिलाफ थे।

भारतीय सेना ने आतंकियों के खिलाफ 28-29 सितंबर 2016 की दरमियानी रात पहली कार्यवाही की। भारतीय कमांडो पीओके के भीतर घुसे और आतंकियों के लांचिंग पैड को नष्ट कर दर्जनों आतंकियों का सफाया करते हुए सकुशल वापस भी आ गए। यदि आतंकियों पर कार्यवाही करने का फैसला उन्होंने लिया तो इसका श्रेय भी उन्हें दिया जाना चाहिए। इसके बाद जैश के एक आतंकी ने 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में आत्मघाती हमला कर 40 से अधिक जवानों को शहीद कर दिया। घटना के जिम्मेदार जैश ए मोहम्मद के पाकिस्तान में खैबर पख्तून प्रांत के बालाकोट स्थित आतंकी प्रशिक्षण शिविर को 26-27 फरवरी 2019 की दरम्यानी रात को भारतीय सेना ने एयर स्ट्राइक कर नष्ट कर दिया और बड़ी संख्या में आतंकियों को मार गिराया।

घटना के बाद देश की जनता का गुस्सा फूटा और वह आतंकियों से बदला चाहती थी इसके अनुरूप प्रधानमंत्री ने फैसला लिया और सेना के जवानों ने अपनी क्षमता का इज़हार पूरी दुनिया को करवा दिया। इस फैसले का श्रेय पिछले प्रधानमंत्रियों की तरह उन्हें दिया जाय तो इसमें कोई शक की गुजाइश नहीं होनी चाहिए। इसी तरह से 27 मार्च 2019 को सामरिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण परीक्षण किया गया जिसमें भारत ने अपने आप को विश्व के उन चार देशों में शामिल कर लिया जिन्होंने जीवित सेटेलाइट को उसकी कक्षा में मार गिराने परीक्षण किया। यह सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भ्री देश के सेटेलाईट को मार गिराना उसे सामरिक दृष्टि से वर्षों पीछे धकेल देने के बराबर होता है। सामरिक हाथियार जो सेटेलाइट के माध्यम से चलते हैं वे पंगु बन जाते हैं इसमें मिसाइलें और संचार प्रणाली जैसे महत्वपूर्ण उपकरण शामिल हैं। इस फैसले का श्रेय भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दिया जाना चाहिए। आज तक सेना के किसी भी कार्यवाही पर देश ने कभी कोई शंका जाहिर नहीं कि और न ही किसी नेता या पार्टी ने इस तरह की हरकत की। लेकिन बीते 5 वर्षों में सेना की कार्यवाही पर विक्षियों ने सबूत मांगने का काम किया है जो घोर निंदनीय है। देश अपनी सेना पर पूरा विश्वास करता है इसलिए देश की रक्षा के लिए उसके बलिदान और साहस भरे कार्य के सबूत नहीं मांगे गए और न ही उसपर कभी सवाल खड़ा किया गया क्योंकि ऐसी परंपरा हमारे देश कभी नहीं रही है।

यदि आपके पास क्षमता है आप क्षमतावान हैं लेकिन आपने अपनी क्षमता का प्रदर्शन और परीक्षण नहीं किया है तो इसे एक झूठ के बराबर कहा जाता है क्योंकि ये आपके पास है लेकिन आपने उसे कभी नहीं दिखाया। यह आपकी क्षमता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करने साथ ही इसके जनकों को निराश कर देने वाला होता है। परीक्षण कर क्षमता का प्रदर्शन करने का निर्णय लेने वाले किसी भी नेतृत्व को उसका श्रेय दिए जाने का इतिहास रहा है। क्योंकि इ्रसे देश के नेतृत्व की राजनैतिक इच्छाशक्ति से जोड़कर देखा जाता है। सम्पादकीय :- मनीष शर्मा

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