पिछले कुछ वर्षों से हिंदी के प्रति आम जनता की रूचि बढ़ती जा रही है। रूचि भले ही धीरे धीरे बढ़ रही है लेकिन इसमें मजबूती दिखाई दे रही है। आज देश के प्रत्येक राज्य में आपको हिंदी भाषी लोग मिल ही जायेंगे। देश के दक्षिणी राज्यों में हिंदी को लेकर कुछ समस्या जरूर है लेकिन यह समस्या पहले से कम ही हुई है। यदि आप हिंदी बोलते हैं तो आपको देश में कहीं भी भाषा की समस्या नहीं आएगी। पहले इलेक्ट्रानिक मीडिया और अब सोशल मीडिया जिसमें समाचारों से लेकर कार्यक्रमों तक जो हिंदी में प्रसारित किये जाते हैं, आम लोगों में हिंदी के प्रति रूचि पैदा करने में अहम भूमिका निभा रहें हैं। इसके पहले हिंदी के प्रसार के साधन सीमित थे। वैसे कई छोटे-बड़े ऐसे साधन कहें या व्यक्ति कहें सभी ने हिंदी को माथे की बिंदी बनाने में अपना भरसक योगदान दिया है इन्हें भी इसका श्रेय दिया जाना जरूरी है। हिंदी के साथ अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं का समावेश बोलचाल में उपयोग किया जाने लगा है यह भले ही थोड़ा अजीब लगे लेकिन यह एक अच्छी बात है। हिंदी और उर्दू का मिलन तो हम बहुत पहले से देख रहें है जिसकी वजह से अक्सर हिंदी को बड़ी बहन और उर्दू को छोटी बहन कहा जाता है। हालांकि पूरी तरह से शुद्ध हिंदी तो आपको साहित्य की किताबों में ही पढ़ने को मिल सकती हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में वहां की क्षेत्रीय भाषा के स्वर का मिश्रण हिंदी के साथ जब सुनने को मिलता है तो उसकी एक अलग ही मिठास कानों तक पहुंचती है। इसे लेकर सोशल मीडिया में कई छोटे बड़े कार्यक्रम कर्णप्रिय और मनोरंजन प्रदान करते हैं। हिंदी बोलने का पंजाबी भाषा का स्वर, दक्षिण के क्षेत्रीय भाषाओं का स्वर, गुजराती भाषा का स्वर हो या देश के किसी भी क्षेत्रीय भाषा का स्वर लोगों को बेहद पसंद आने लगा है। यह तभी संभव हो पाया है जब लोगों ने बोलचाल में हिंदी को अपनी क्षेत्रीय भाषा का उपयोग शुरू किया है। हिंदी के प्रसार के लिए नेताओं की भूमिका पहले से बेहतर हुई है। देश के बड़े नेता देश के भीतर ही नहीं बाहर भी हिंदी में भाषण देने लगे हैं। देश के बाहर अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम में हिंदी में भाषण देने के लिए देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल जी का ही नाम आता था। देश के भीतर हो या बाहर हिंदी में भाषण देने से लोगों को हिंदी के प्रति रूचि पैदा होती है और रूची पैदा होने पर भाषा को सीखने और बोलने की इच्छा प्रबल होती है। देश के बाहर नेताओं का हिंदी में भाषण देने को हिंदी का अंतराष्ट्रीय प्रचार कहा जाएगा। हिंदी के प्रसार के लिए अभी और भी कार्य करने की आवश्यकता है। हिंदी अभी पूरी तरह से कामकाज की भाषा नहीं बन पायी है। यदि ऐसा हो गया तो यह एक बड़ा कदम होगा।

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